गरीबी ने इंडोनेशियाई MMA स्टार लिंडा डैरो को महानता की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित किया – ‘वो समय काफी मुश्किल था’

Undefeated knockout artist Linda Darrow

अपराजित नॉकआउट एथलीट लिंडा डैरो आखिरकार ONE Championship में पहुंच गई हैं। अब वो ये दिखाने के लिए बेताब हैं कि इंडोनेशियाई फाइटर्स MMA के उच्चतम स्तर पर मुकाबला करने और जीत दर्ज करने में सक्षम हैं।

ONE Fight Night 7: Lineker vs. Andrade II में 33 साल की फाइटर खतरनाक ब्राजीलियाई एथलीट विक्टोरिया सूज़ा के खिलाफ डेब्यू करेंगी, जिसका सीधा प्रसारण थाईलैंड के बैंकाक के ऐतिहासिक लुम्पिनी बॉक्सिंग स्टेडियम से होगा।

डैरो के लिए शनिवार, 25 फरवरी को होने वाला ये मुकाबला जीवनभर की ट्रेनिंग, कड़ी मेहनत व लगन के साथ उनके लंबे संघर्षों का एक इम्तिहान होगा।

यहां हम आपको बताएंगे कि किस तरह एटमवेट में 6-0 का रिकॉर्ड रखने वाली एथलीट ने अपने देश में गरीबी से निकलकर मार्शल आर्ट्स के ग्लोबल स्टेज तक पहुंचने का सपना पूरा किया।

मार्शल आर्टिस्ट्स का एक परिवार

सुमात्रा शहर के जांबी में एक गरीब परिवार में जन्मीं लिंडा डैरो तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं और शायद ही उन्होंने जीवन का कोई पल कॉम्बैट स्पोर्ट्स के बगैर जिया हो।

इंडोनेशियाई स्टार का मार्शल आर्ट्स से गहरा नाता है। उन्होंने 6 साल की कम उम्र से ही अपनी ट्रेनिंग शुरू कर दी, 9 साल की उम्र में बॉक्सिंग शुरू की, युवावस्था में वुशु सांडा के साथ जुड़ीं और 22 साल की उम्र में MMA में ट्रेनिंग लेने लगी थीं।

हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट स्पोर्ट सीखने वाला जीवनभर का समर्पण डैरो के खून में है क्योंकि वो एक मार्शल आर्टिस्ट्स के परिवार से आती हैं।

उन्होंने ONEFC.com को बताया:

“मेरे माता-पिता हमेशा कहते थे कि मार्शल आर्ट्स हमेशा मेरा बचाव करने में मदद करेगा। वो ये भी कहते थे कि इसे सीखने से मुझे चैंपियन बनने का मौका भी मिल सकता है।

“मेरे पिता एक जूडो फाइटर थे। वो ओलंपिक स्तर तो नहीं लेकिन क्षेत्रीय स्तर के एथलीट थे और मार्शल आर्ट्स से बहुत प्यार करते थे। मेरे दोनों बड़े भाई मार्शल आर्ट्स फाइटर हैं। दूसरा बड़ा भाई अब भी बॉक्सिंग करता है और एक ट्रेनर भी है।”

अभाव में गुज़रा जीवन

लिंडा डैरो भले ही आज एक वर्ल्ड क्लास मार्शल आर्टिस्ट हों, जो ONE Championship में बेहतरीन फाइटर्स के साथ मुकाबला करने को तैयार हों, लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं था।

उन्हें यहां तक पहुंचने के लिए दृढ़ निश्चय, कड़ी ट्रेनिंग और धैर्य से होकर गुज़रना पड़ा, जो उनकी कठोर परवरिश को दर्शाता है। हमेशा समर्थन और प्यार करने वाले माता-पिता होने के बावजूद उन्हें बहुत गरीबी से गुज़रना पड़ा था। उन्होंने लंबे समय तक जीवन में संघर्ष किया, जिसकी कुछ लोग ही कल्पना कर सकते हैं।

अब पीछे मुड़कर देखने पर वो परिवार द्वारा बिताए गए कठिन वक्त को याद करते हुए कहती हैंः

“मेरे स्वर्गीय पिता सेना में थे और मां गृहिणी थीं। पिता की सैलरी ज्यादा नहीं थी और कम पैसों में ही उन्हें अपने तीन बच्चों की परवरिश करनी पड़ी थी।

“हमारे पास चूल्हे के लिए गैस तक नहीं थी। हमें कम से कम चीजों में ही गुज़ारा करना पड़ता था। यहां तक कि पेट भरने के लिए हमें वाइल्ड यम्स (फल) पर निर्भर होना पड़ता था। हमें स्कूल भी कई किमी. पैदल चलकर जाना पड़ता था। उस वक्त हम सुमात्रा में रहते थे। मैंने वो पल भी अनुभव किए, जब मैं स्कूल जाना चाहती थी लेकिन ऐसा करने के लिए पैसे नहीं थे। मेरा भाई स्कूल की फीस देने के लिए एक मोटरसाइकिल टैक्सी ड्राइवर बन गया था।”

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अपनी गरीबी को ही भाग्य के रूप में स्वीकार करने को डैरो तैयार नहीं थी। उन्होंने उस कठिन वक्त का सदुपयोग खुद को महान बनाने के लिए किया। उन्होंने खुद को कठिन ट्रेनिंग में पूरी तरह झोंक दिया क्योंकि वो बेहतर जीवन जीने के लिए संघर्ष करना जानती थीं।

अब जब वो खुद एक मां हैं, ऐसे में सुमात्रा की एथलीट ने ठान लिया कि वो वापस फिर से बचपन के गरीबी के दिनों का फिर से कभी अनुभव नहीं करना चाहेंगी।

उन्होंने बतायाः

“मुझे जिस चीज़ ने वर्ल्ड चैंपियन बनने के लिए प्रेरित किया, वो 1998 का आर्थिक संकट था, जब मुझे और मेरे परिवार को बिना चावल खाए दो साल तक रहना पड़ा था।

“वो समय काफी मुश्किल था, जब जीवन बहुत ज्यादा गरीबी से गुजर रहा था। ऐसे में मैं और ज्यादा पैसा कमाने के लिए प्रेरित हुई। मैं ये कभी नहीं चाहती हूं कि मेरी मां या मेरा बच्चा भूखा रहे क्योंकि क्योंकि हमारे पास खाने-पीने के पैसे नहीं हैं।”

सबसे बड़ी उपलब्धि

गुज़रे हुए गरीबी के पलों के साथ डैरो के ONE Championship में डेब्यू की खुशी इंडोनेशियाई फैंस के चेहरे पर साफ झलक रही है। अब वो अपने देश की फाइटर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धियां हासिल करते हुए देखने को तैयार हैं।

हालांकि, डैरो को अपने देश का झंडा सर्कल के अंदर ले जाने पर बहुत गर्व है। ऐसे में Han Fight Academy की एथलीट जीत के लिए बेकरार देश की भावनाओं को महसूस कर सकती हैं। फिर भी उस दबाव के बावजूद उनके दिल में ग्लोबल स्टेज पर मुकाबला करने की खुशी है।

लिंडा ने कहाः

“मुझे जब फोन आया था तो मैं खुशी से उछल पड़ी। इस वजह से मैंने अपने कॉन्ट्रैक्ट को छिपाकर रखा। मैं अपने फैंस को निराश नहीं करना चाहती। फैंस ने मुझ पर भरोसा जताया है। मैं थोड़ा घबरा रही थी क्योंकि बहुत सारे फैंस मुझे फिर से फाइट करते देखना चाहते थे इसलिए मैंने हर दिन भगवान से प्रार्थना की कि मेरा ONE डेब्यू हो और ऊपरवाले की महरबानी से वो मौका भी आ गया।”

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इसमें कोई शक नहीं कि उन पर जीतने का दबाव और अपने देश के बेहतर प्रतिनिधित्व का बोझ है। फिर भी डैरो ने उस दबाव को अपनी प्रेरणा में तब्दील कर दिया और प्रिसिला हरटाटी लुम्बन गॉल से प्रेरणा ली, जो रिटायर्ड इंडोनेशियाई ONE सुपरस्टार होने के साथ सर्कल के अंदर 12 रोमांचक MMA बाउट जीतने वाली एथलीट हैं।

डैरो को उम्मीद है कि लुम्बन गॉल ने जहां से छोड़ा था, वहीं से वो शुरुआत करेंगी और इंडोनेशिया को MMA की ताकत के रूप में स्थापित करेंगी।

33 साल की एथलीट ने कहाः

“यही वो वजह है, जिसके कारण मैं आत्मविश्वास से भरी हुई हूं और ONE से जुड़ी हूं। मैं इंडोनेशिया और दुनिया को दिखाना चाहती हूं कि इस देश के पास भी तगड़े फाइटर्स हैं। ये मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा में से एक है।”

“ये अभियान प्रिसिला हरटाटी ने शुरू किया था, लेकिन अब उनका एक परिवार है। अभियान को जारी रखने की अब मेरी बारी है।”

सही ढंग से नए सफर की शुरुआत करना

डैरो को अपने प्रोमोशनल डेब्यू में एक कड़ी परीक्षा से होकर गुज़रना पड़ेगा, जो 25 साल की विक्टोरिया सूज़ा के खिलाफ अपने 6-0 के अपराजित रिकॉर्ड को दांव पर लगाएंगी।

फिर भी इस पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय उनकी प्रतिद्वंदी सर्कल में क्या पैंतरे आज़मा सकती हैं, इस पर उनका ध्यान होगा। इंडोनेशियाई फाइटर अपनी तैयारी को लेकर चिंतित हैं क्योंकि उनका लक्ष्य अपने रिकॉर्ड में एक और नॉकआउट शामिल करना है।

ये एक ऐसी रणनीति है, जिसने उभरती हुई स्टार के करियर में बेहतर ढंग से काम किया है। ऐसे में डैरो ने अपनी सभी बाउट्स को फिनिश ही किया है।

25 फरवरी को सूज़ा के खिलाफ अपनी बाउट को देखकर उनका इरादा अपनी पुरानी रणनीतियों को जारी रखना ही होगा।

लिंडा डैरो ने कहाः

“मेरा एक लक्ष्य है कि मैं किसी भी तरह से अपनी बाउट जीतूं। नॉकआउट और तकनीकी नॉकआउट मेरे लिए बोनस के तौर पर होंगे। मैं जब रिंग में होती हूं तो मुकाबले को फिनिश करना मेरी सहज आदत में शुमार होता है। अगर मुझे मौका मिला तो मैं फिनिश करके दिखाऊंगी। एक बात तो तय है कि मैं हर राउंड में उन पर हावी होने की कोशिश करूंगी।”

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