रिंग ही नहीं गुरदर्शन मंगत ने जिंदगी में भी कड़ा संघर्ष कर हासिल किया भारत के नम्बर 1 एमएमए चैंपीयन का खिताब

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मिक्स्ड मार्शल आर्ट में यदि किसी भारतीय की बात की जाए तो गुरदर्शन ‘सैंट लॉयन’ मंगत का नाम सबसे ऊपर आता है। उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े मिक्स्ड मार्शल आर्ट संगठन ONE Championship में अपनी प्रतिभा व ताकत का लोहा मनवा लिया, लेकिन क्या आप जानते हैं उनके भारत के नम्बर 1 एमएमए चैंपीयन बनने के पीछे उन्होंने कितना संघर्ष किया है।

मंगत ने अपनी पारिवारिक कमजोरी को कभी भी अपनी मानसिक कमजोरी नहीं बनने दिया। यही कारण है कि उन्होंने रिंग के साथ जिंदगी में भी कड़ा संघर्ष करते हुए यह खिताब हासिल किया है। कनाडा में अप्रवासी भारतीय माता-पिता के साथ पले-बड़े गुरुदर्शन “संत सिंह” मंगत का बचपन ज्यादा अच्छा नहीं रहा। अपने माता-पिता के साथ अंग्रेजी में बात करने में असमर्थ होने तथा अपनी जिंदगी में पाश्चात शैली को जल्दी से अपनाना उनके लिए बहुत मुश्किल था।

परिवार में सबसे बड़ा बेटा होने के कारण गुरदर्शन को अन्य बच्चों की तरह अपना बचपन जीने का मौका नहीं मिला। उसे अपने परिवार व भाई-बहनों के भविष्य के लिए किशोर अवस्था में ही व्यस्कों जैसा व्यवहार करना पड़ा रहा था। वह अपने भाई-बहनों के लिए एक रोल मॉडल बनना चाहता था, जिसे देखकर वह भी कुछ कर सके।

गुरुदर्शन के लिए स्कूल जाना एक युद्घ मैदान में संघर्ष करने जैसा था। इतना ही नहीं बचपन में उसे अस्थमा ने अपनी चपेट में ले लिया था। स्कूल में वह हकलाते हुए अंग्रेजी बोलता था। जिसके कारण उसे कई बार अपमान झेलना पड़ा, लेकिन इसके बाद भी मंगत ने हार नहीं मानी और आगे बढ़ने की प्रेरणा लेकर संघर्ष करता रहा।

वहां यदि उन्हें कहीं से थोड़ा बहुत प्यार मिलता था तो वह थे उसके चचेरे भाई। जो उन्हें अपमानित करने की जगह सीखने के लिए प्रेरित करते थे। गुरदर्शन बताते हैं कि “बड़े होकर, मैंने अपने चचेरे भाई को देखा, जो गुजर गए … उनका एक बड़ा कॉमिक बुक कलेक्शन था, जो मुझे रोमांचित करता था और वह हमेशा मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता था।”

मंगत के जीवन की सबसे बड़ी बात यह है कि वह कभी भी एमएमए में नहीं आना चाहते थे, वह तो सिर्फ अपने परिवार के लिए एक अच्छी नौकरी जैसे एकाउंटेंट बनना चाहते थे, लेकिन एक दिन उन्होंने टीवी पर रिच फ्रैंकलिन को देखा और उससे प्रभावित हो गए। उन्होंने अपने दोस्तों से कहा कि जब फ्रेंकलिन ऐसा कर सकता है तो मैं क्यों नहीं। इस पर उनके आसपास के सभी लोग जोर से हंस पड़े और उन्हें पागल कहने लगे।

गुरदर्शन बताते हैं कि अपने जीवन के पहले 22 सालों में मैने हमेशा दूसरों की सलाह पर काम किया और परिवार को आगे बढ़ाया। रिच को टीवी पर देखने से मुझे वहां से बाहर निकलने और उसके जैसा कुछ करने की ताकत मिल गई। ऐसे में उन्होंने एमएमए के बारे में कुछ भी जाने बिना एमएमए फाइटर बनने का निर्णय कर लिया।

उन्होंने बताया कि एमएमए में जाने और उसकी तैयारी के लिए कोई कोच रखने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। ऐसे में वह एमएमए के बेहतरीन योद्घाओं की फाइट के फुटेज देखकर उनकी तकनीक जानने की कोशिक करने लग गए। एमएमए में पहले दिन से ही मेरी सोच में वह मानसिक मजबूती का खेल था, लेनिक अन्य योद्घा इसे ताकत का खेल मानते थे। मैं हमेशा रिंग में छोटा फाइटर था और ताकत की जगह तकनीकों पर निर्भर रहता था। मुझे हर उस व्यक्ति की तुलना में मानसिक रूप से तेज होने की आवश्यकता थी, जिससे मैंने लड़ाई की। इसका मुझे फायदा भी मिला और मैने कई फाइट जीती और आज इस मुकाम को हासिल कर लिया।

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