सोशल एंजाइटी से लंबे वक्त तक जूझे डेनियल विलियम्स ने बताया – ‘इसने मुझे सबसे अलग कर दिया था’

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“मिनी टी” डेनियल विलियम्स मनोरंजक और दमदार स्टाइल की वजह से कम समय में ONE Championship में फैंस के पसंदीदा फाइटर बन गए, लेकिन हमेशा उन्होंने ऐसी चमक-धमक का आनंद नहीं लिया है।

असलियत में थाई-ऑस्ट्रेलियाई स्टार बेहद शर्मीले और खुद पर भरोसा ना करने वाले बच्चे के रूप में बड़े हुए, जिन्हें ज्यादातर समय असहज महसूस होता था।

विलियम्स 25 मार्च को ONE Fight Night 8: Bhullar vs. Malykhin में फिर से एक्शन में नज़र आएंगे। वो सिंगापुर इंडोर स्टेडियम में स्ट्रॉवेट मॉय थाई बाउट में रुई बोटेल्हो का सामना करेंगे।

इवेंट में विलियम्स का एक आत्मविश्वास से भरपूर रूप दिखाई देगा, जो उनके युवा स्वरूप से पूरी तरह अलग होगा।

वो अब बोटेल्हो के खिलाफ अपनी तैयारियों के अंतिम चरण में हैं। ऐसे में मुकाबले से पहले 29 साल के फाइटर ने खुद को कमज़ोर करने वाली सोशल एंजाइटी के साथ अपने कई साल के संघर्ष के बारे में बात की और बताया कि कैसे मार्शल आर्ट्स ने उन्हें इससे उबारने में मदद की।

“मिनी टी” ने ONEFC.com को अपने किशोरावस्था के दिनों के बारे में बताया:

“मैं बहुत शर्मीला बच्चा था। मेरा एक दोस्तों का ग्रुप था, जिनके साथ में सहज रहता था, लेकिन मैं एक गर्लफ्रेंड को पाने की कोशिश नहीं कर सकता था। मुझे लड़कियों से डर लगता था। अगर मेरा जीवन उन पर निर्भर होता तो मैं उनसे बात भी नहीं कर सकता था। इस वजह से हाईस्कूल का वक्त मेरे लिए बहुत चुनौतीपूर्ण रहा था और उनसे दोस्ती करना भी।”

विलियम्स अपने कॉलेज के दिनों के दौरान सोशल एंजाइटी से घिरे थे। इसने उनके अंदर लोगों से साधारण बातचीत करने में भी झिझक पैदा कर दी थी।

उन्होंने याद करते हुए बतायाः

“मैं हमेशा खुद से बात करता था। मैं टीचर्स से भी मदद के लिए नहीं कह सकता था, जो बहुत अजीब बात थी। मैं बहुत ज्यादा शर्मीला था।

“मुझे नहीं पता था कि किसी से कैसे बात की जाती है। फिर मैं उन बातों से बहुत घबरा जाता था, जो मैंने बाद में कहीं थीं। इन चीजों ने मुझे सच में सबसे अलग कर दिया था।”

अपनी पहचान को ढूंढना

“मिनी टी” को लगता है कि उनको कमजोर बना देने वाली एंजाइटी व्यक्तिगत पहचान के साथ उनका संघर्ष थी या इसकी कमी।

आधे थाई और आधे ऑस्ट्रेलियाई के रूप में नस्लीय टिप्पणियों से गुज़रते हुए वो बड़े हुए, जिसने उनके विश्वास को कमज़ोर कर दिया कि वो सच में वहां के लोगों की तरह नहीं थे।

उन्होंने बतायाः

“एक बच्चे के रूप में मैं खुद को अलग महसूस करता था क्योंकि मैं एक गोरा ऑस्ट्रेलियाई फुटबॉल खिलाड़ी बनना चाहता था। मेरे सभी दोस्त ऐसे ही थे। मुझे लगता था कि मैं स्कूल में सबसे अलग बच्चा था। वहां मिश्रित नस्ल के ज्यादा स्टूडेंट्स नहीं थे। मुझे सॉकर के मैदान पर होने वाली टिप्पणियों से नफरत थी। भले ही वो उतनी भद्दी ना हों, लेकिन ये नस्लीय टिप्पणियों की तरह ही थीं।”

अपनी मिश्रित नस्ल की वजह से विलियम्स लोगों के समूह के बीच सच में कभी भी सहज महसूस नहीं करते थे। चाहे थाईलैंड हो या ऑस्ट्रेलिया, वो दोनों जगहों के लिए बाहरी इंसान थे।

अलग नस्ल के होने की भावना हर रोज उन्हें अंदर से खोखला करती जा रही थी। वो सार्वजनिक जगहों पर जाने में भी असहज महसूस करने लगे थे:

“मैं खुद से भी असहज रहने लगा था। छुट्टियों में मुझे थाईलैंड आना अच्छा नहीं लगता था। मुझे उत्तरी थाईलैंड में रहने से नफरत थी क्योंकि वहां मेरे और मेरे भाई जैसे इतने सारे विदेशी नहीं थे। वो बस घूरते रहते थे। मुझे शॉपिंग सेंटर भी जाना अच्छा नहीं लगता था। वहां भी लोग मुझको बस एक टक देखते रहते थे। ये चीजें मुझे परेशान करती थीं। वो मुझे ही क्यों घूर रहे हैं? इस वजह से भी मैं बहुत असहज होता गया।”

मार्शल आर्ट्स ने जीवन उबारा

अपनी खुद की पहचान के साथ असहज महसूस करने वाले विलियम्स का हद से ज्यादा शर्मीलापन उनके आत्मविश्वास की कमी का कारण बनता गया था।

अच्छी बात ये है कि मार्शल आर्ट्स ने उनकी इन चीजों को बदल दिया।

एक पूर्व WMC मॉय थाई वर्ल्ड चैंपियन “मिनी टी” अब MMA और मॉय थाई दोनों में ONE की स्ट्रॉवेट रैंकिंग्स में टॉप-5 में जगह रखते हैं। यही नहीं, वो व्यापक रूप से संगठन के सबसे मनोरंजक फाइटर्स में से एक माने जाते हैं।

कॉम्बैट स्पोर्ट्स के लिए उनकी प्रतिभा जगजाहिर है। ऐसे में कैसे इस स्पोर्ट्स ने उनके खोए हुए आत्मविश्वास को पाने में मदद की और आखिरकार उन्हें सोशल एंजाइटी से लड़कर जीतने की ताकत प्रदान की:

“मार्शल आर्ट्स आपके आत्मविश्वास को मजबूत करने का बेहतर मंच है। दरअसल, इसके जरिए आप अपने कंफर्ट जोन से शारीरिक और मानसिक रूप से बड़े पैमाने पर बाहर निकलना शुरू कर देते हैं। ये खुद में सुधार का एक कारगर तरीका है। मुझे लगता है कि मार्शल आर्ट्स मेरे जीवन को उबारने वालों में से एक है। ये मुझे जिंदगी जीने का जुनून देता है और खुद को बेहतर तरीके से समझने में मदद करता है।”

असल में, मार्शल आर्ट्स ने विलियम्स को आत्मचिंतन का एक मजबूत हथियार दिया है। फाइटिंग ने उन्हें सिखाया कि वो कौन हैं और उन्हें जीवन में अपने उद्देश्यों को खोजने के लिए मजबूर किया।

इसके साथ ही वो याद करते हैं कि अपने करियर की शुरुआत में अक्सर उन्हें रिंग के अंदर विरोधियों से मार खाने में बहुत तसल्ली मिलती थी।

29 साल के फाइटर जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो उन्हें आश्चर्य होता है कि क्या वो चीजें उनकी आंतरिक भावनाओं की वजह से उभरी थीं:

“हम क्यों फाइट करते हैं? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि हम अपने आप से इतने असहज हो जाते हैं कि उस दर्द को सहना पसंद करते हैं? मुझे नहीं पता। कह सकते हैं कि मेरा फाइटिंग स्टाइल पहले इस वजह से ऐसा था क्योंकि मैं खुद से बहुत असहज था। मुझे नहीं पता ऐसा क्यों था? अब मैं उन सारी चीजों से बाहर निकल चुका हूं।

“ऐसा इसलिए था क्योंकि मैंने कभी खुद से उतना प्यार नहीं किया। ये मेरे लिए एक ऐसी जगह थी, जहां मैं खुद को सजा दे सकता था, लेकिन खुद को उस हताशा से बाहर निकालता भी था। दरअसल, उस वक्त आपके दिमाग में बहुत से विचार चलते होंगे। मुझे ऐसा लगता है कि जब आप हर समय शर्मीले और घबराए हुए परेशान रहते हैं तो ऐसा ही होता है। जैसे आपके सिर पर ढेर सारी हताशा हावी हो और आपको बस उसे खत्म करने की जरूरत हो।”

अगली पीढ़ी की मदद करना

आजकल स्ट्रॉवेट स्टार एक शर्मीले बच्चे के रूप में अपने अनुभवों का इस्तेमाल उन बच्चों की मदद करने में कर रहे हैं, जो इन्हीं समस्याओं से ग्रसित हो सकते हैं।

विलियम्स को अच्छे से याद है कि खुद पर शंका करना, अनिश्चितता होना और अपनेपन की कमी के साथ हर दिन जिंदगी में संघर्ष करना कितना मुश्किल होता था।

उन्हें ये भी याद है कि कुछ खास तरह के शब्द कितने प्रभावशाली हो सकते हैं। इसी वजह से वो अपने जिम में ट्रेनिंग लेने वाले किसी भी एथलीट को स्पेशल फील करवाने का लक्ष्य लेकर चलते हैं:

“मिनी टी” ने आगे कहाः

“मैं फाइटिंग से बाहर की चीजों के बारे में बात करने में भी काफी अच्छा हूं। कहने का मतलब है कि मार्शल आर्ट्स और अन्य चीजों के बारे में। फिर चाहे वो जो शर्ट पहनकर आ रहे हों और उसके बारे में ही क्यों ना बात करनी हो। उनके साथ मैं ये छोटी-छोटी चीजों पर बात करने की कोशिश करता हूं। उनके आने पर उनका नाम याद रखता हूं। ये मुझे हमेशा से पसंद था।

“लोग जब आपको याद रखते हैं या आपको तवज्जो देते हैं तो वो असलियत में आत्मविश्वास बढ़ाने वाली बात होती है। ये बिल्कुल ऐसा ही होता है कि ‘ओह, मुझे देखा जा रहा है। मैं हमेशा कोने में ही नहीं खड़ा रहता हूं।”‘

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